आर्य समाज के संस्थाप महर्षि दयानन्द सरस्वती जन्मदिन विशेष

बुलंद गोंदिया।(आचार्य नरेंद्र)-स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म १२ फरवरी १८२४ को टंकारा गुजरात में कृष्ण लाल जी के यहाँ हुआ इनकी माता जी का नाम यशोदा था। भारतीय समाज में ऐसे कई समाज सुधारक हुए जिन्होंने समाज के ढ़ांचे को पूरी तरह बदल कर रख दिया । ऐसे ही समाज सुधारकों में से एक हैं आर्य समाज के संस्थापक और महान समाज सुधारक स्वामी दयानन्द सरस्वती । महर्षि दयानन्द सरस्वती आर्य समाज के प्रवर्तक और प्रखर सुधारवादी सन्यासी थे । महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भारतीय समाज को पिछडेपन से दूर करने के लिए पुराने रीति रिवाजों को बन्द करने का आह्वान तो किया ही साथ ही उन्होंने ज्ञान से लिए संस्कृत भाषा का भी प्रयोग किया जो यह दिखाता है कि वह नए और पुराने में सामंजस्य बना कर रखते थे ।
गृह त्याग के बाद मथुरा में स्वामी विरजा नन्द के शिष्य बने । शिक्षा प्राप्त कर गुरु की आज्ञा से धर्म सुधार हेतु ‘पाखण्ड खण्डिनी पताका’ फहराई । स्वामी जी के जीवन की कुछ अहम घटनाएं घटी जिनकी उनके जीवन पर बेहद असर पड़ा ।
चौदह वर्ष की अवस्था में मूर्तिपूजा के प्रति विद्रोह (जब शिवचतुर्दशी की रात में इन्होंने एक चूहे को शिव की मूर्ति पर चढ़ते तथा उसे गन्दा करते देखा) किया और इक्कीस वर्ष की आयु में विवाह का अवसर उपस्थित जान, घर से निकल पड़े । घर त्यागने के पश्चात १८ वर्ष तक इन्होंने सन्यासी का जीवन बिताया । इन्होंने बहुत से स्थानों में भ्रमण करते हुए कतिपय आचार्यों से शिक्षा प्राप्त की ।
इस प्रकार बचपन से ही दयानन्द सरस्वती ने आध्यात्म की ओर रुख मोड़े रखा । धर्म सुधार हेतु अग्रणी रहे महर्षि दयानन्द सरस्वती ने १८७५ में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की थी । वेदों का प्रचार करने के लिए उन्होंने पूरे देश का दौरा करके पंडित और विद्वानों को वेदों की महत्ता के बारे में समझाया । स्वामी जी ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुन: हिन्दू बनने की प्रेरणा देकर शुद्धि आंदोलन चलाया । सन्‌ १८८६ में लाहौर में स्वामी दयानन्द के अनुयायी लाला हंसराज ने दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की थी । हिन्दू समाज को इससे नई चेतना मिली और अनेक संस्कारगत कुरीतियों से छुटकारा मिला । स्वामी जी एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे । उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया । उनका कहना था कि किसी भी अहिन्दू को हिन्दू धर्म में लिया जा सकता है । इससे हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन रूक गया ।
समाज सुधारक होने के साथ ही दयानंद सरस्वती जी ने अंग्रेजों के खिलाफ भी कई अभियान चलाए । “भारत, भारतीयों का है ” यह अँग्रेजों के अत्याचारी शासन से तंग आ चुके भारत में कहने का साहस भी सिर्फ दयानन्द में ही था । उन्होंने अपने प्रवचनों के माध्यम से भारतवासियों को राष्ट्रीयता का उपदेश दिया और भारतीयों को देश पर मर मिटने के लिए प्रेरित करते रहे ।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिन्दी भाषा को अपनाया । उनकी सभी रचनाएं और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ मूल रूप में हिन्दी भाषा में लिखा गया । आज भी उनके अनुयायी देश में शिक्षा आदि का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं ।
स्वामी जी का देहांत ३० अक्तूबर सन् १८८३ को दीपावली के दिन संध्या के समय हुआ ।

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