विशेष लेख
बुलंद गोंदिया। पत्रकारिता केवल नाम के आगे पत्रकार लगाने, गले में पहचान पत्र लटकाने या राजनीतिक नेताओं के दरवाजे पर उठक-बैठक करने का क्षेत्र नहीं है। पत्रकारिता समाज के प्रति प्रतिबद्धता, सत्य की खोज, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और सत्ता से सवाल पूछने का नैतिक साहस है। लेकिन आज इस पवित्र क्षेत्र की स्थिति ऐसी बनती जा रही है कि कोई भी व्यक्ति पत्रकार बनकर घूमने लगता है। जिसे समाचार का ‘न’ तक नहीं मालूम, जिसे पत्रकारिता के मूल्यों, अध्ययन और लेखन की समझ नहीं है, उसके गले में भी पत्रकार का पहचान पत्र दिखाई देने लगा है।
राजनीतिक नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की पत्रकारों के प्रति नाराजगी या असहजता कई बार समझ में आती है। जब पत्रकार सवाल पूछते हैं, अनियमितताओं को उजागर करते हैं और सत्ता के गलत निर्णयों पर उंगली उठाते हैं, तो कई लोगों की भौंहें तन जाती हैं। लेकिन जब आम नागरिक भी पत्रकार के रूप में घूमने वाले लोगों पर सवाल उठाने लगें, तब पत्रकारिता के क्षेत्र को आत्ममंथन करना आवश्यक हो जाता है।
जनता का पत्रकारिता पर विश्वास कमजोर होना किसी एक व्यक्ति की बदनामी नहीं, बल्कि पूरे पत्रकारिता जगत के लिए खतरे की घंटी है।
लोगों की हर आलोचना सही हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन आलोचना के पीछे के कारणों को समझने का साहस पत्रकारों में होना चाहिए। हर आलोचना को विरोधियों की साजिश मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। पत्रकारों को अपनी भूमिका, चरित्र, निष्पक्षता और नैतिकता जनता के सामने साबित करनी होगी।
दिवाली तक पत्रकार, सालभर श्रमिक पत्रकारों की बदनामी!
दिवाली नजदीक आते ही अचानक स्वयंघोषित पत्रकारों का उदय होने लगता है। जिन्हें सालभर पत्रकारिता के क्षेत्र में कहीं देखा नहीं जाता, वे दिवाली के दिनों में अचानक पत्रकार बनकर सक्रिय हो जाते हैं। पहचान पत्र, मुलाकातें, शुभकामनाएं और विभिन्न अपेक्षाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है। दिवाली समाप्त होते ही ये पत्रकार कहां गायब हो जाते हैं, इसका पता तक नहीं चलता।
इसका सबसे अधिक नुकसान उन श्रमिक पत्रकारों को उठाना पड़ता है, जो सालभर समाचार संकलन, रिपोर्टिंग, विज्ञापन जुटाने, भागदौड़ और सामाजिक जिम्मेदारियों के माध्यम से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं।
स्वयंघोषित पत्रकारों के कारण कई बार ईमानदार पत्रकारों को भी संदेह की नजर से देखा जाता है। पत्रकारिता के नाम पर किसी एक व्यक्ति के गलत व्यवहार का बोझ पूरे पत्रकारिता जगत को उठाना पड़ता है। इस स्थिति में बदलाव जरूरी है।
पत्रकार कौन? अब इसकी भी होनी चाहिए परीक्षा!
पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश के लिए कोई अनुशासन, प्रशिक्षण, अध्ययन या नैतिक मापदंड नहीं होने चाहिए क्या?
पत्रकार कौन है, उसका पत्रकारिता में योगदान क्या है, उसने कितनी खबरें की हैं, कितने सामाजिक मुद्दे उठाए हैं और उसे पत्रकारिता के मूलभूत मूल्यों की कितनी समझ है, इसकी पड़ताल होनी चाहिए।
पत्रकारिता के नाम पर पहचान पत्र बांटने वाली संस्थाओं और संगठनों को भी आत्ममंथन करना चाहिए। केवल सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए किसी को भी पत्रकार की मान्यता देना बंद होना चाहिए। पत्रकारिता प्रशिक्षण, आचार संहिता, वास्तविक कार्य अनुभव और नैतिक जिम्मेदारी को महत्व दिया जाना चाहिए।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पत्रकार बनने के लिए किसी विशेष डिग्री या प्रमाणपत्र को अनिवार्य बनाने का संकीर्ण आग्रह नहीं है। अनेक उत्कृष्ट पत्रकारों ने अपने अनुभव और मेहनत से पहचान बनाई है। लेकिन पत्रकारिता के नाम पर होने वाले दुरुपयोग को रोकने के लिए पारदर्शी और विश्वसनीय जांच व्यवस्था आवश्यक है।
पत्रकारिता का चरित्र बचाने आगे आएं जिम्मेदार संगठन!
पत्रकारिता किसी की गुलाम नहीं हो सकती। वह किसी राजनीतिक दल का प्रचार तंत्र नहीं, अधिकारियों की पैरवी करने का मंच नहीं और न ही निजी स्वार्थ साधने का साधन है। पत्रकार की वास्तविक पहचान उसकी लेखनी के निर्भीकपन और उसकी भूमिका की निष्पक्षता से बनती है।
आज पत्रकारिता के क्षेत्र में स्वच्छता अभियान चलाने की आवश्यकता है। पत्रकार संगठनों को केवल सम्मान समारोह, सम्मेलन और पद वितरण तक सीमित न रहकर पत्रकारिता की विश्वसनीयता बचाने के लिए ठोस भूमिका निभानी चाहिए।
स्वयंघोषित पत्रकारों के नाम पर होने वाले गलत कार्यों का विरोध करना और वास्तविक श्रमिक पत्रकारों के सम्मान के लिए एकजुट होना समय की मांग है।
यदि पत्रकारिता बदनाम होती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को होगा। सत्ता से सवाल पूछने वाला, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाला और कमजोर वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाला पत्रकार यदि समाज से गायब हो गया, तो लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ कमजोर हो जाएगा।
पत्रकारिता को पहचान पत्रों की भीड़ नहीं, निर्भीक और ईमानदार पत्रकार चाहिए!
अंततः सवाल यही है कि केवल गले में पत्रकारिता का पहचान पत्र लटका लेने से कोई पत्रकार नहीं बन जाता, तो फिर पत्रकार होने का वास्तविक मापदंड तय कौन करेगा?
पत्रकारिता के नाम पर बाजार सजाने वालों को रोकना ही होगा। पत्रकारिता आजीविका का साधन हो सकती है, लेकिन यह केवल कमाई का धंधा नहीं है। यह जनता के विश्वास की जिम्मेदारी है और इस विश्वास को कायम रखने की जिम्मेदारी सबसे पहले पत्रकारों की ही है।
पत्रकारिता को पहचान पत्रों की भीड़ नहीं, बल्कि निर्भीक, अध्ययनशील, ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारों की आवश्यकता है।
लेखक : पत्रकार नयन मोंढे
विदर्भ प्रदेशाध्यक्ष
महाराष्ट्र राज्य मराठी पत्रकार संघ, मुंबई
महाराष्ट्र राज्य पत्रकार संघ, मुंबई






